Swami Vivekanand Quotes In Hindi


§  उठोजागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये ।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो सत्य हैउसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहोउससे किसी को कष्ट होता है या नहींइस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती हैऔर उन्हें बहा ले जाती हैतो ले जाने दोवे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव होतब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।

-स्वामी विवेकानन्द

§  ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैंइस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करोमनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैंसभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगेमर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।

-स्वामी विवेकानन्द

§  ज्ञान स्वयमेव वर्तमान हैमनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह हैएवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी हैक्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैंनिश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैंऔर यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता हैउसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा हैउससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगाकिन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैंवे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैंजो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता हैअंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता हैजो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता हैदेवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करतेइसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होताअतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता हैवही  इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

§  हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती हैउतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता हैऔर उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मन का विकास करो और उसका संयम करोउसके बाद जहाँ इच्छा होवहाँ इसका प्रयोग करोउससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखोऔर जिस ओर इच्छा होउसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता हैवह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लोउसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।

-स्वामी विवेकानन्द

§  सभी मरेंगे- साधु या असाधुधनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठोजागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्रचाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बलजिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

-स्वामी विवेकानन्द

§  संन्यास का अर्थ हैमृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैंपरन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।

-स्वामी विवेकानन्द

§  हे सखेतुम क्योँ रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्तुम्हारा नाश नहीं हैंसंसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैंवही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ! (वि.स. ६/८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओहुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो — यह दुनिया भयानक हैकिसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं हैमाँ मेरे साथ हैं — इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात काकिसका भयवज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।
(विवेकानन्द साहित्य खण्ड-४पन्ना-३१५) (४/३१५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कुद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उध्दार में लगे हुए हैंवे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर – गुल मचाओ की उसकी आवाज़ दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैंजो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैंकिन्तु कार्य करने के समय उनका पता नही चलता है। जुट जाओअपनी शक्ति के अनुसार आगे बढो।इसके बाद मैं भारत पहुँच कर सारे देश में उत्तेजना फूँक दूंगा। डर किस बात का हैनहीं हैनहीं हैकहने से साँप का विष भी नहीं रहता है। नहीं नहीं कहने से तो नहीं‘ हो जाना पडेगा। खूब शाबाश! छान डालो – सारी दूनिया को छान डालो! अफसोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो – चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते –

-स्वामी विवेकानन्द

§  तमाम संसा हिल उठता। क्या करूँ धीरे – धीरे अग्रसर होना पड रहा है। तूफ़ान मचा दो तूफ़ान! (वि.स. ४/३८७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओजब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर हैकौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता हैयदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि.स.४/३२०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दालक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न होतुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मेतुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। (वि.स.६/८८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  श्रेयांसि बहुविघ्नानि अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं। — प्रलय मचाना ही होगाइससे कम में किसी तरह नहीं चल सकता। कुछ परवाह नहीं। दुनीया भर में प्रलय मच जायेगावाह! गुरु की फतह! अरे भाई श्रेयांसि बहुविघ्नानिउन्ही विघ्नों की रेल पेल में आदमी तैयार होता है। मिशनरी फिशनरी का काम थोडे ही है जो यह धक्का सम्हाले! ….बडे – बडे बह गयेअब गडरिये का काम है जो थाह लेयह सब नहीं चलने का भैयाकोई चिन्ता न करना। सभी कामों में एक दल शत्रुता ठानता हैअपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या कामसत्यमेव जयते नानृतंसत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती हैमिथ्या की नहींसत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) …धीरे – धीरे सब होगा।

-स्वामी विवेकानन्द

§  वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्यमनुष्य — जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहोऔर तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो — व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत हैइसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं। (वि.स. ४/३९५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जायेगीदुनिया बच्चों का खिलवाड नहीं है — बडे आदमी वो हैं जो अपने हृदय-रुधिर से दूसरों का रास्ता तैयार करते हैं- यही सदा से होता आया है — एक आदमी अपना  शरीर-पात करके सेतु निर्माण करता हैऔर हज़ारों आदमी उसके ऊपर से नदी पार करते हैं। एवमस्तु एवमस्तुशिवोsहम् शिवोsहम् (ऐसा ही होऐसा ही हो- मैं ही शिव हूँमैं ही शिव हूँ। )

-स्वामी विवेकानन्द

§  मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चेमैं जितना उन्नत बन सकता थाउससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँअवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालनध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना — इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता। (वि.स.६/३५२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे, “भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।” सब विषओं में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुनाकबीरदास के दोहे में है- “हाथी चले बाजार मेंकुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिंजो निन्दे संसार” ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता। (वि.स.३/३८१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा- ठहरो- धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है- तुमसे कहता हूँ देखना- कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति आवश्यक न हो- बहुत्व में एकत्व सार्वजनिन भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो “सार्वजनीनता” के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँदेश जाऊँ या न जाऊँतुम लोग अच्छी तरह याद रखना किसार्वजनीनता- हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि, “दुसरों के धर्म का द्वेष न करना”नहींहम सब लोग सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उन्का ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं सावधान रहनादूसरे के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना – इसी भँवर में बडे-बडे जहाज डूब जाते हैं पुरी भक्तिपरन्तु कट्टरता छोडकरदिखानी होगीयाद रखना उन्की कृपा से सब ठीक हो जायेगा।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जिस तरह होइसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पडे- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाये- हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों सम्पूर्ण शुध्दचरित्र हों।

-स्वामी विवेकानन्द

§  नीतिपरायण तथा साहसी बनोअन्त: करण पूर्णतया शुध्द रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो — प्रणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैंवीर पुरूष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते — यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चोतुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरतापाप्असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिएबाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।(वि.स.१/३५०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  शक्तिमानउठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्मनिरन्तर कर्मसंघर्ष निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो — सारा धर्म इसी में है। (वि.स.१/३७९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  क्या संस्कृत पढ रहे होकितनी प्रगति होई हैआशा है कि प्रथम भाग तो अवश्य ही समाप्त कर चुके होगे। विशेष परिश्रम के साथ संस्कृत सीखो। (वि.स.१/३७९-८०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो। (वि.स.४/३१९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चोंधर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता हैव्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करनाइसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता हैवह नहींकिन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडेतो उससे विचलित न होनामुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी। (वि.स.१/३८०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बालकोंदृढ बने रहोमेरी सन्तानों में से कोई भी कायर न बने। तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है – सदा उसीका साथ करो। बिना विघ्न – बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता हैसमयधैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है। मैं तुम लोगों को ऐसी बहुत सी बातें बतलाताजिससे तुम्हारे हृदय उछल पडतेकिन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तो लोहे के सदृश दृढ इच्छा-शक्ति सम्पन्न हृदय चाहता हूँजो कभी कम्पित न हो। दृढता के साथ लगे रहोप्रभु तुम्हें आशीर्वाद दे। सदा शुभकामनाओं के साथ तुम्हारा विवेकानन्द। (वि.स.४/३४०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जब तक जीनातब तक सीखना‘ — अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। (वि.स.१/३८६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जीस प्रकार स्वर्ग मेंउसी प्रकार इस नश्वर जगत में भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण होक्योंकि अनन्त काल के लिए जगत में तुम्हारी ही महिमा घोषित हो रही है एवं सब कुछ तुम्हारा ही राज्य है। (वि.स.१/३८७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पवित्रतादृढता तथा उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ। (वि.स.४/३४७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  भाग्य बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का ही साथ देता है। पीछे मुडकर मत देखो आगेअपार शक्तिअपरिमित उत्साहअमित  साहस और निस्सीम धैर्य की आवश्यकता है- और तभी महत कार्य निष्पन्न किये जा सकते हैं। हमें पूरे विश्व को उद्दीप्त करना है। (वि.स.४/३५१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पवित्रताधैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य सभी धीरे धीरे होते हैं। (वि.स.४/३५१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना — यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरजसाहसपवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगेतब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे — माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे। (वि.स.४/३५६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चोंजब तक तुम लोगों को भगवान तथा गुरू मेंभक्ति तथा सत्य में विश्वास रहेगातब तक कोई भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। किन्तु इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर परिणाम विपत्तिजनक है। (वि.स.४/३३९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  महाशक्ति का तुममें संचार होगा — कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओविश्वासी होओऔर आज्ञापालक होओ। (वि.स.४/३६१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बिना पाखण्डी और कायर बने सबको प्रसन्न रखो। पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर दृढ रहो और फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएँ क्यों न होंकुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही। (वि.स.४/३६२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लडो! रुपये – पैसे के व्यवहार में शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारीभक्ति और विश्वास हैतब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हे सफलता मिलेगी। (वि.स.४/३६८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो पवित्र तथा साहसी हैवही जगत् में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगेआत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः। (वि.स.४/२७६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  ईर्ष्या तथा अंहकार को दूर कर दो — संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो। (वि.स.४/२८०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पूर्णतः निःस्वार्थ रहोस्थिर रहोऔर काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करोक्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे बच्चेआत्मविशवास रखोसच्चे और सहनशील बनो।(वि.स.४/२८४)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगेतो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते होतो पहले अहं‘ ही नाश कर डालो। (वि.स.४/२८५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल हैयह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते होतो याद रखो उसीसे भविष्य में कलह का बिजारोपण होगा। (वि.स.४/३१२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहेतो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान् पाप हैउससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा। (वि.स.४/३१३)

-स्वामी विवेकानन्द

§  गम्भीरता के साथ शिशु सरलता को मिलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है। (वि.स.४/३१८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चेजब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी — तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकोंकार्य करते रहो। (वि.स.४/३३२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रेसर हो रहे हैंतब तक उन्के कार्य में सहायता करोऔर जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आयेतो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बडा हाथ है। (वि.स.४/३१५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओजब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर हैकौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता हैयदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि.स. ४/३२०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुध्दिमानी नहीं है। बुध्दिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खडा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा। (वि.स. ४/३२८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चेजब तक हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास – ये तीनों वस्तुएम रहेंगी – तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकोंकार्य करते रहो। (वि.स. ४/३३२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  आओ हम नामयश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। कामक्रोध एंव लोभ — इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा। (वि.स. ४/३३८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  न टालोन ढूँढों — भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेहेउसके लिए प्रतिक्षा करते रहोयही मेरा मूलमंत्र है। (वि.स. ४/३४८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  शक्ति और विशवास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठापवित्र और निर्मल रहोतथा आपस में न लडो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है। (वि.स. ४/३६९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  एक ही आदमी मेरा अनुसरण करेकिन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगाभले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करोवे ही तुम्हे धोखा देंगे। (वि.स. ४/३७७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरा आदर्श अवश्य ही थोडे से शब्दों में कहा जा सकता है – मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देनातथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना। (वि.स. ४/४०७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जब कभी मैं किसी व्यक्ति को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्ण रूप से निमग्न पाता हूँजो भविष्य में संसार में शान्ति की वर्षा करने वाली हैतो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मैं पागल नहीं हो जाता हूँयही आश्चर्य की बात है। (वि.स. १/३३४६ फरवरी१८८९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बसन्त की तरह लोग का हित करते हुए‘ – यहि मेरा धर्म है। “मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार हैबसन्तवल्लोकहितं चरन्तः- यही मेरा धर्म है।” (वि.स.४/३२८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है — उपहासविरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता हैलोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते है। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैंपरन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान् में अपरिमित विश्वास रखना चाहिएतब ये सब लुप्त हो जायेंगे। (वि.स.४/३३०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता हैतो छुतही बिमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सीर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है– वह कितना ही फटा-पुराना क्यों न हो– तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जायउसके लिए कहीं रोक-टोक नहींऐसा कोई नहींजो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड्म्बना की बात क्या हो सकता हैआइएदेखिए तो सहीदक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गज़ब कर रहें हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या मे ईसाई बना रहे हैं। …वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को क्यों दोष दूँहें भगवानकब एक मनुष्य दूसरे से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा। (वि.स.१/३८५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सकेफिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहींजो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी होंपरन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचतेतभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफान के जितने तुमुल झकोरे आयेंवह मकानजो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना हैहिल नहीं सकता। (वि.स.१/३८९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करोतो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगेकिन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को वन्द कर दोवे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे – स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? … जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते होव्यर्थ बकवाद करने वालोतुम लोग क्या होआओइन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालोतुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठेसैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवालेयुगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वालेभला बताओ तो सहीतुम कौन होऔर तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? …किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी – गीरी के लिए अथवा बहुत हुआतो एक वकील बनने के लिए जी – जान से तडप रहे हो — यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्द बच्चे पैदा हो जाते हैंजो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ‘ रोटी दोरोटी दो ‘ चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमागाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओमनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों कोजो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैंठोकरें मारकर निकाल दोक्योंकि उनका सुधार कभी न होगाउन्के हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड – मूल से निकाल फेंको। आओमनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखोअन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम हैयदि हाँ‘ तो आओहम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखोअत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते होंतो रोने दोपिछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है — मस्तिष्क – वाले युवकों कापशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है… ( वि.स.१/३९८-९९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  न संख्या-शक्तिन धनन पाण्डित्यन वाक चातुर्यकुछ भी नहींबल्कि पवित्रताशुध्द जीवनएक शब्द में अनुभूतिआत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दोजिन्होने अपने बन्धन तोड डाले हैंजिन्होने अनन्त का स्पर्श कर लिया हैजिन्का चित्र ब्रह्मनुसन्धान में लीन हैजो न धन की चिन्ता करते हैंन बल कीन नाम की और ये व्यक्ति ही संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे। (वि.स.४/३३६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, ” जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता हैतभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह प्रमात्मा का दर्शन करता हैवह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैंपरन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्य्क्ष आचरण नहीं करता। (वि.स.४/३३७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है — वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्र्ष्ट महात्मा हैंवे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हे नामयशधनस्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धिब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म-जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एकदेवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया। (वि.स. ४/३३७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो सबका दास होता हैवही उन्का सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच – नीच का विचार होता हैवह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं हैजो ऊँच – नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकताउसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है। (वि.स. ४/४०३)

-स्वामी विवेकानन्द

§  वत्सधीरज रखोकाम तुम्हारी आशा से बहुत ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडो कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगेवे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्सकठिन परिश्रम्! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखनाऔर अपने आदर्शों पर जमे रहनाजब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतिक्षा करता हैउसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो। (वि.स. ४/३८७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  अकेले रहोअकेले रहो। जो अकेला रहता हैउसका किसीसे विरोध नहीं होतावह किसीकी शान्ति भंग नहीं करतान दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है। (वि.स. ४/३८१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान हैजो संसार को हिला सकती हैधीरे – धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। साहसी‘ शब्द और उससे अधिक साहसी‘ कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते होहम बार – बार पुकारेंजब तक सोते हुए देवता न जाग उठेंजब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या हैइससे महान कर्म क्या है? (वि.स. ४/४०८)

-स्वामी विवेकानन्द




अगर आपके पास कोई  INSPIRATIONAL स्टोरी हो तो मुझे सेंड करें मै उसे आपके नाम से पोस्ट करूँगा  | 
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